
जब-जब बादल धरती से मिलने आते हैं,
सूखी आँखों में भी सपने मुस्कुराते हैं।
बारिश केवल पानी की बूँदें नहीं होती,
यह तो ईश्वर की भेजी हुई आशाओं की चिट्ठी होती है।
बूँदों ने जैसे ही माटी का माथा चूमा,
हर सूनी राह ने जीवन का गीत गुनगुनाया।
खेतों की प्यास ने हरियाली का आँचल ओढ़ लिया,
किसान के चेहरे पर बरसों बाद सुकून उतर आया।
कच्चे आँगन में कागज़ की नावें फिर तैरने लगीं,
बचपन भीगकर फिर से खिलखिलाने लगा।
माँ की हथेलियों की गरम पकौड़ियों में
घर का हर कोना प्रेम से महकने लगा।
पेड़ों ने झूमकर हवा का अभिनंदन किया,
चिड़ियों ने भी नए सुरों में गीत सुनाए।
जैसे प्रकृति ने थके हुए मन से कहा—
“अँधेरों के बाद ही उजालों के मौसम आते हैं।”
बारिश हमें यह भी सिखा जाती है—
जो झुकना जानते हैं, वही जीवन से भर जाते हैं।
जो बाँटना जानते हैं, वही बादल बनते हैं,
और जो बरसना जानते हैं, वही खुशियाँ बो जाते हैं।
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र













