
पुष्पों की सुगंध बिखेरे, जीवन हो मधुमय प्यारा,
प्रेम, दया, सद्भाव जगाएँ, यही प्रकृति का है नारा।
भोर सुनहरी जब मुस्काए, कलियाँ धीरे-धीरे खिलतीं,
मंद समीर संग मुस्काकर, खुशियों की सौगातें मिलतीं।
महक उठे हर मन का आँगन, मिट जाए हर अँधियारा,
प्रेम, दया, सद्भाव जगाएँ, यही प्रकृति का है नारा।
गुलाब सिखाए प्रेम लुटाना, कमल रहे निर्मल मन वाला,
चंपा, बेला, चमेली महकें, संदेश दें उजियाला।
रंग-बिरंगे पुष्प सदा ही, भरते जग में नव उजियारा,
प्रेम, दया, सद्भाव जगाएँ, यही प्रकृति का है नारा।
जीवन भी हो पुष्प समान, खुशबू सबसे बाँटें हम,
कटुता, द्वेष मिटाकर अपने, प्रेम-दीप फिर जलाएँ हम।
मानवता की राह सजाएँ, बनकर जग का दृढ़ सहारा,
प्रेम, दया, सद्भाव जगाएँ, यही प्रकृति का है नारा।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार













