Uncategorized
Trending

आदमी मुसाफ़िर है

कभी कभी आदमी दो राहे पर खड़ा होकर सोचता हि रह जाता है

न इधर को ,न उधर को
हम जाएं तो जाएं किधर को आदमी समझ नहीं आता है ।

यदि रास्ता मालूम नहीं, तो भ्रम गहराता हि जाता है , कि मैं कहां आ गया।

आदमी के विचार दो पक्षों में उलझे हुए रहतें है,

अब मैं क्या करूं? सवाल खड़ा हो जाता है

समझदार है तो रास्ता ढूंढ हि लेता है।

दो विचारों में उलझीं बुद्धि मुट्ठी में
सिमट कर रह जाए तो फैंसला मुश्किल हो जाता है,

आदमी को अपना जीवन भ्रम में हि कटता है,
परिवार की खातिर सोचता है कि
उसके जाऊं या नहीं,
उसके निमंत्रण दिया जाए या नहीं,
नहीं कोई लिमिट,न हि फैसला
और ऐसा भी समय आता है कि हम कबिरा कि तरह चौराहे पर खड़े होकर दुसरों की ख़ैर मनाते हैं, और खुद परेशान हैं।

आदमी सोचता है
भीड़ में अकेला हूं और मेरे पास कोई नहीं, मैं किसी को जानता नहीं ,

यह ऐसा मुद्दा है जिस पर चलकर लोग जीवन एक तरफा कर लेते हैं,

खुद को पहचानों

आप किसी भी मायने में कम नहीं हो,
आदमी स्वयं को लेकर खुश रहना सिखें, तो जीवन बहुत सुंदर है।

विचार परिवर्तन हि है जो जीवन जीना सिखाता है,

अशोक सुमन भवानी मंडी (राज.)

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *