
समय की गति भी कितनी विचित्र होती है। कभी रुलाती है, तो कभी अतीत की किसी भूली-बिसरी खुशी को नए रूप में लौटा भी देती है।
पड़ोस की रोशनी, जिसके बिना राखी का त्योहार अधूरा-सा लगता था। हर साल रक्षाबंधन की सुबह वह राखी बाँधने आती, और मैं अक्सर तब तक सोकर उठा भी नहीं होता था। फिर शुरू हो जाता उसका मीठा-सा डाँटना, स्नेह भरी नोंक-झोंक और छोटी-सी लड़ाई।
मैं कहता, “तू मुझे सोने भी नहीं देती।” और वह मुझे खूब डाँटती। यह सब माँ रसोई से सुनती रहतीं और मंद-मंद मुस्कुराती रहतीं। फिर हँसते हुए कहतीं, “तुम दोनों की लड़ाई कभी खत्म नहीं होगी।” इतना कहकर फिर रसोई में चली जातीं।
स्कूल से कॉलेज पहुँचे, फिर कॉलेज के बाद उसकी शादी हो गई। उसके बाद भी जब कभी मुलाकात होती, वही हँसी-मजाक , वही नोंकझोंक और वही अपनापन बना रहा।
वक्त गुजरता रहा, लेकिन एक दिन यही वक्त ने ऐसी बेरहम करवट ली कि कोविड कॉल के उस काले दौर में रोशनी हमें छोड़कर हमेशा के लिए भगवान को प्यारी हो गई। सब कुछ इतना अचानक हुआ कि आज तक दिल यह स्वीकार ही नहीं कर पाया कि वह खिलखिलाती हुई रोशनी अब इस दुनिया में नहीं रही।
उसके जाने के बाद कई साल बीत गए। रक्षाबंधन का त्योहार मेरे लिए बस एक शांत, उदास और खामोश दिन बनकर रह गया।
लेकिन वक्त ने एक बार फिर मुझे आश्चर्य चकित कर दिया।
लगभग पाँच-छह साल बाद, इस बार रक्षाबंधन की सुबह किसी नन्हे-से हाथ ने मेरे गाल को धीरे से छुआ। एक चुलबुली-सी आवाज़ कानों में मिश्री की तरह घुली और वह मेरे बिस्तर पर आकर बैठ गई।
उसने मुझे प्यार से हिलाते हुए कहा, “मामा जी… मामा जी… मैं राखी बाँधने आई हूँ।”
मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। एक पल को लगा जैसे मैं कोई सपना देख रहा हूँ। लेकिन सामने रोशनी की नन्ही बेटी किरण खड़ी थी।
मैंने हड़बड़ाकर कहा, “अरे… मैं तो अभी तैयार भी नहीं हुआ हूँ।”
उसने तुरंत दोनों हाथ कमर पर रखे और बिल्कुल अपनी माँ रोशनी की तरह तुनक कर बोली –मैं कुछ नहीं जानती, गलती आपकी है ,मैं तो ऐसे ही राखी बांधकर जाऊंगी, बालहठ के आगे मैं झुक गया, जब उसने अपने छोटे-छोटे हाथों से मेरी कलाई पर राखी बांधी ,तो लगा जैसे आसमान से किसी कोने से , रोशनी मुस्कुरा रही हो। और मुझ पर अपने आशीर्वाद के फूल बरसा रही हो।
जाते-जाते मुझे पूरे हक़ से धमकी देते हुए बोली सूनों मामा जी अगली राखी पर सुबह-सुबह तैयार मिलेंगे, वरना ऐसे ही डांटकर राखी बांधकर चली जाऊंगी और हंसते हंसते चली गई। वह तो चली गई,लेकिन मेरे कमरे की फिजाओं में रोशनी की खुशबू छोड़ गई।
मैं देर तक अपनी कलाई पर बंधी उस राखी को निहारता रहा, चेहरा आंसुओं से भीग गया था, लेकिन ओंठो पर मुस्कान थी और मन ही मन देर तक सोचता रहा और उस ऊपर वाले को याद करते हुए दिल ने कहा — ” ऐ वक्त!तू कितना भी निर्मम क्यों न हो जाए, प्रेम का अंत करने की ताकत तेरे पास भी नहीं है। तूने रोशनी को छीनकर बेशक! कुछ देर तक अंधेरा कर दिया था, लेकिन आज उसी की नन्ही परी किरण को भेज कर फिर से रक्षाबंधन पर्व को रोशनी से उजाला कर दिया।
आज! रक्षाबंधन है! और मैं बड़े सबेरे से ही नहा – धोकर तैयार बैठा हूं — अपनी उस नन्हीं चुलबुली किरण के इंतजार में ——-!!
बलराम राठौर “भावना”











