
कब दिन निकला,कब सूरज ढला,
कब रात हुई पता ही नहीं चला,
साल के ये तीन सो पेंसठ दिन,
जागे भागे किस के लिए,
पता ही नहीं चला,
कब हो गये साठ साल के,,
पता ही नहीं चला,
भाई जान कहते थे अब नानू – दादू पुकारते हैं बच्चे हमको,
कब नाना दादा हो गये हम,
पता ही नहीं चला,
बचपन के नादानी भरें दिनों से चले तो,
जवानी के अल्हड़ पन,रपट के, बुढ़ापे के सुहाने दोनों में कब आ गये,
पता ही नहीं चला,
हमने क्या खोया क्या पाया हमने
कितना लुटा कितना बांधा हमने,
कितना पिछे छुट गया सफर में,
पता ही नहीं चला,
पर जो भी मिला वो प्रयाप्त था उस समय पर,
बहुत दिया खुदा ने हमको अब तक,
इतना खर्च कर चुके हैं हम पता ही नहीं चला,
इतना जी लिया उम्मीद से ज्यादा,
इतना हंस लिया
हद से ज्यादा,
हमको पता ही नहीं चला।।
अशोक सुमन भवानी मंडी (राज.)











