
विषय – प्राकृतिक आपदा
क्यों आज हिमालय रोया है,क्यों सन्नाटा छाया है,
जिस धरती पर जीवन था,वहीं दर्द उतर आया है।
टूटे हैं सपनों के घर,सूनी हुईं कई राहें,
आँखों में ठहरी हैं यादें,होंठों पर खामोश आहें।
हे नेपाल, मत हार अभी,ये रात भी ढल जाएगी,
जो धरती आज है घायल,फिर फूलों से सज जाएगी।
तेरे आँसू व्यर्थ नहीं,तेरी पीड़ा सब समझेंगे,
गिरकर भी जो उठना जाने, फिर से कदम सँभलेंगे।
नदियों ने अपना दर्द सुनाया,पर्वत भी सहम गए,
कितने ही हँसते-खेलते पल,एक पल में थम गए।
लेकिन राख नहीं है अंत,उम्मीद अभी भी ज़िंदा है,
हर मदद का बढ़ता हाथ,इंसानियत का वादा है।
हे नेपाल, मत हार अभी,ये रात भी ढल जाएगी,
जो धरती आज है घायल,फिर फूलों से सज जाएगी।
कल फिर सूरज निकलेगा,कल फिर गीत सुनाई देंगे,
नेपाल की इन वादियों में,फिर सपने मुस्कुराएँगे।
रीना पटले शिक्षिका
जिला-सिवनी मध्यप्रदेश













