
सत्य पर रहे अटल… थे तुम सदा ही निश्छल
संबंध तभी निभें
मार्ग से हट कर छू लें तल।
सत्य पर चलना है असि की धार
त्याग कर वो सब
जो आत्मा को नहीं स्वीकार
जीत न सको संबंधों में
धर्म तुला पे तर्क चाहे हजारों हजार।
संबंध बने रहें
आत्मा चाहे दे तुम्हें दुत्कार
सदा कलिकाल में
झुक जाना रहे स्वीकार।
जग में संबंध ही मानव जीवन का आधार।
दुर्जन हो या सुजन
मना लो चाहे सत्य नहीं उन्हें स्वीकार
हार में जीत के फल मिलेंगे
छोड़ दो विधि के दरबार।
एक दिन आएगा अवश्य
जग में झुका जो
न पड़ा मझधार
सदैव धर्म-कर्म पर अटल जन
करे वैतरणी पार।
महेश शर्मा, करनाल













