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कुंभकर्ण

नग के समान काया विशाल, निरख जगत भय खाता था।
कुंभकर्ण अतीव बलशाली,सुभट दशानन भ्राता था।।

जब भी रखता धरती पर पग,धरा डोलने लगती थी।
चहुँदिशि में मच जाती हलचल, मृत्यु दौड़ने लगती थी।
डरकर आँखें मुँद जातीं थीं,चीख गूँजने लगती थी।
कुंभकर्ण को देख सभी की,हलक सूखने लगती थी।

सब जीव जन्तु छिप जाते थे,जब भी वो गुर्राता था।
कुंभकर्ण अतीव बलशाली, सुभट दशानन भ्राता था।।

झाड़ी समान काली मूँछें,मुख आधा ढक जाता था।
विशाल वट सी दोनों बाजू,देख जगत घबराता था।
हाथी से भी ज्यादा भोजन,एक पहर में खाता था।
पेट बहुत ही भारी भरकम,नजर नगाड़ा आता था।

सीना चौड़ा पत्थर समान,जो टकराए मिट जाता था।
कुंभकर्ण अतीव बलशाली,सुभट दशानन भ्राता था।।

छह मास अनवरत सोता था,उतने दिन ही जगता था।
कितना ज्यादा दौड़े-भागे,कभी भी नहीं थकता था।
राक्षस कुल का था वीर किन्तु,ब्रम्ह नाम जप करता था।
जो भी उससे टकराता था,पल में प्राणों को हरता था।

जब भी सो करके उठता था,सारा दिन बस खाता था।
कुंभकर्ण अतीव बलशाली, सुभट दशानन भ्राता था।।

लाल-लाल बड़ी-बड़ी आँखें, देख सभी डर जाते थे।
पैरों के नीचे दब करके,कई जीव मर जाते थे।
बड़े-बड़े नाखून नुकीले,दाँत बहुत ही काले थे।
रस्सी के जैसे अति लम्बे,बाल घने घुँघराले थे।

सोना-खाना उसके मन को, सबसे ज्यादा भाता था ।
कुंभकर्ण अतीव बलशाली, सुभट दशानन भ्राता था।।

-राम जी तिवारी"राम"
                        उन्नाव (उत्तर प्रदेश)

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