मैं तो एक पानी का,
बुद-बुदा हूँ,
तेरी एक नज़र से,
रौशन मेरा जहाँ है,
वरना खंडहर वीराना हूँ,
तेरे दर पर, अपना शीश
नवाता हूँ।
अच्छी और सच्ची राह पर,
चलने की तौफीक मुझे दे,
यहीं आँखें मूंद, तेरे रूब -रु,
बुद -बुदाता हूँ।
मैं तो एक पानी का ,
बुद -बुदा हूँ,
कब मेरा हवा में
विलय हो जाएं और
आसमा में समाजाऊं,
इसका भी मुझे अंदेशा नहीं।
पर तुझ से इलतेजा है ,
अय रब!
जब कभी मेरा दिल घबराये
किसी राह पर चलने के लिए
क़दम डगमगाए,
अपना आशीष सदा हम पर
बनाएं रखना, ता कि दिल को
एक सुकुन मिल जाये।
डॉ. शेख परवीन
तह.देगलूर, जिला – नांदेड़,
महाराष्ट्र।













