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नदी की व्यथा

सांस लेने की भी नदियों को नहीं आज़ादी है,
बारिशों की क्या ख़ता, न ये बाढ़ की बरबादी है ।

पेड़ों की सारी जड़ें एक एक कर खुलती रहीं, 
कंकृीट के गलियारों में झीलें सभी दबा दी है ।

रेत की चूड़ियाँ पहने नदी चुपचाप बहती थी,
तुमने कलाई पर लोहे की हथकड़ी चढ़ा दी है।

चाँद उतरता था कभी जिसकी हथेली चूमने,
तुमने उस दर्पण में पत्थर की लकीरें बना दी हैं।

उसके आँचल में थे पलते किनारों के कितने गाँव,
तुमने उस आँचल की सिलवट तक उधड़वा दी है।

वह तो सदियों से तुम्हारे पाप धोती आई थी,
तुमने ही दामन में उसके कालिख अपनी लगा दी है।

कितनी सभ्यताएँ उतरती थीं कभी उसके चरणों में,
उन पदचिह्नों पर कंक्रीट की मुहर तुमने लगा दी है।

जिसकी लहरों में ऋचाएँ गुनगुनाती थीं कभी,
उसके कंठ में तुमने शोर की जंजीरें लगा दी हैं।

बस्तियों की रस्सियों से अर्थी तुमने सजाई थी,
अब भी जिंदा हूं नदी ने बात ये बता दी है ।

तुमने सोचा मूक है इसकी सीमाएं लांघ लो,
पर गरज कर यूं बही हस्ती तुम्हारी मिटा दी है ।

बांध की कीलें जो उसकी छाती में ठोकी गईं,
उनसे ही लाशें तुम्हारी ताबूतों में लगा दी हैं ।

इसका दामन तुमने अपनी करनी से मैला किया,
सौगातें जितनी थी तुम्हारी सब ही तो लौटा दी है ।

बस्ती डूबी, हस्ती डूबी और डूबे जान-ओ-तन,
समझो क्यूं कुदरत ने तुमको इस तरह सजा दी है ।

हिमालय की रगों से जो नदी उतरती थी धरा पर,
तुम्हारी आग से पिघलते हिम ने उसकी धार बढ़ा दी हैं।

हिमशिखर की गोद से निकली हुई निर्मल कथा,
हर मोड़ पर तुमने उसकी गाथा अधूरी बना दी है।

रेत तुमने लूट ली, जंगल भी सारे मिटा दिए,
अब नदी के वेग ने मिट्टी तुम्हारी बहा दी है।

बादलों को दोष देकर बच न पाओगे कभी,
आसमानों, ने भी अन्याय, पर आवाज़ उठा दी है!

विकास की अंधाधुनी दौड़ से उपजे विनाश की,
पिघलते हिम ने भविष्य की तस्वीर आज दिखा दी है!

कुदरतों के साथ तुमने जो किया वर्षों तलक,
वक़्त ने बस आज उसकी एक किश्त लौटा दी है।

नदियों की धड़कनों पर तुमने पहरे बिठा दिए,
रास्तों पर बहने के हर जगह रोक लगा दी है!

कहीं बाँधों की दीवारें, कहीं तटबंधों का जाल,
पाँव बाँधकर नदियों के तुमने उसे सज़ा दी है।

कल-कल कभी, जो तुम्हारे, खेतों को सींचती रही,
उसकी हर धार में, तुमने हलाहल मिला दी है।

मोड़कर उसकी धारा अपनी सुविधा के वास्ते,
तुमने उसकी हर सहज चाल पर पाबंदी लगा दी है !

जिस जगह तुमने समझकर अपना घर पक्का किया,
वहीं नदी ने एक दिन अपनी ज़मीन बता दी है।

मत समझना लौटकर वह फिर तुम्हें माफ़ करेगी,
हर लहर ने अपनी स्मृति सीने में बचा ली है।

नदियों को बाँधोगे तो सैलाब बनकर आएगी,
उसने आज़ादी की कीमत अब तुम्हें समझा दी है।

अब जो उफनती निकली है तो हैरान होना मत,
उसके धैर्य की तुमने अंतिम गाँठ तक खुलवा दी है।

जिस नदी को तुमने समझा था कि मुट्ठी में रहेगी,
उसकी लहरों ने मुट्ठी की लकीरें ही बहा दी हैं।

नदी बहती है तो धरा की लकीरें साँस लेती हैं,
तुमने उसकी साँस रोकी, उसने धरती हिला दी है।

अब भी सुन लो उसके तट पर पड़ी खामोश आहटें,
एक नदी ने अपनी सदियों की गवाही सुना दी है।

ग्लेशियर थे पर्वतों की आँखों के ठहरे से आँसू,
धरती की तपिश ने उनकी सोई रवानी जगा दी है।

मत समझना मौन है तो पीर उसकी मर गई,
एक थपेड़े ने किनारों की हदें समझा दी हैं।

पर्वतों के सीने में तुमने सुरंगें खोद दीं,
धरती की हर एक धड़कन आज तुमने दबा दी है।

संकेत है वो बढ़ती जलराशि केवल बाढ़ नहीं,
हिमनद की पिघली आँखों ने चेतावनी सुना दी है।

अब भी उसके बहने का अधिकार लौटा दो उसे,
फिर वगरना कहना मत कि नदी ने क्यों सज़ा दी है।

अन्यथा कल इतिहास के पन्ने यही कहेंगे “माहिर”,
आदमी ने अपनी दुनिया ख़ुद ही तो जला दी है।

विरेन्द्र जैन “माहिर”
नागपुर महाराष्ट्र

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