
भादों मास, अष्टमी तिथि,रात अंधियारी।
रोहिणी नक्षत्र ,खुल गई थी बेड़ियाॅं सारी।
कृष्ण जन्म हुआ,सो गये थे सभी दरबान-
धन्य हुए वसुदेव खुशियाॅं जग में पधारी।
उसी समय छायीं थी घनघोर घटायें।
कान्हा को वासुदेव गोकुल पहुंचाये।
कृष्ण के चरण छूने यमुना बढ़ी अपार –
शेष नाग छत्रछाया करते फन उठाये।
गोकुल में वसुदेव ने सब को सोता पाया।
यशोदा की योगमाया को चुपके से उठाया।
अपने लाल कृष्ण को वहां ही लिटाया –
वापस आये बेड़ियाॅं में रक्षक सूचना दे आया।
कभी माखन चुराया, कभी रास रचाया,
कभी कालिया मर्दन कर, जग को राह दिखाया।
कंस का संहार कर, धर्म की ज्योति जलाया-
गीता का उपदेश दिया,रणभूमि में नीति सिखाया।
आज भी उस रूप को, हर मन अपनाए है,
हर बरस अष्टमी को, मंगल दीप जलाए है।
भक्ति में रमती धरा, शुचि प्रेम रीति सिखलाए हैं।
जय श्रीकृष्ण गूँजता घर- घर, राधे-राधे कहलाए हैं।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर बिहार











