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मेघ

दब गईं हैं बीज की मिट्टी में जो सम्भावनाएँ
पात पीले पड़ गये मुरझा गयीं हैं चेतनाएँ
मेघ दानी हो धरा की पीर करसो
ओ घटा घनघोर बरसो

तृप्त हों अब थार मरुथल
घाटियाँ हों या कि जंगल
नीर निर्मल है तुम्हारा
चातकी फिर क्यों विकल ?

तितलियों के पंख पर लिख दो नई संकल्पनाएँ
बूँद कह देना पिहू से अब न तरसो
ओ घटा घनघोर बरसो

दृष्टि में क्या फाग है अब
कंठ में क्या राग है अब
डबडबाई आँख है बस
जल रही एक आग है अब

दिख रहीं है विचलनों के पार कुछ निश्चिन्तताएँ
अंतरतटों के दाह पर निर्बंध परसो
ओ घटा घनघोर बरसो

बंधनों में यूँ कसे हम
बस तमस से हैं घिरे तम
ये अमर पीड़ा शिविर हैं
वंचनाओं में फँसे हम

तोड़ कर तटबंध सारी बह रहीं हैं वर्जनाएँ
उँगलियों से छू लो धारासार हरसो
ओ घटा घनघोर बरसो
के वी

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