
जिंदगी है ,
एक पागल की हंसी !
एक कंगाल की मुट्ठी का
बन्द एहसास !
जिंदगी कुटिल द्रोणाचार्य है !
और वक्त एक
कपटी बगुला !
जो बार-बार
मूर्ख एकलव्यों से
कटवा लेती है
उनका अँगूठा !
जो पलक झपकते ही
निगल जायेगा
तालाब की सुनहरी मछली !
जिंदगी है
एक लावारिस आह !
सपनों की देह से
फूटा हुआ
ज़हर वाद !
दर्द के खण्डहर में
सर पटकता मौन का प्रेत !
भूल पश्चाताप ,
और फिर दोहराव !
गिरना और बिखरना !
टूटना और फिर
कभी न जुड़ना !
इसी अनवरत
सिलसिले का
नाम है जिंदगी !
जिंदगी एक तीखा गरल
भी है ,
जिसे पी करके
जो जी सकता है वही होता है ,
वास्तव मेँ शम्भु …
स्वयंभू !!
के वी












