
संतोषम् परम् सुखम्, सत्य है ये उक्ति
सुखी वही रहा जगत मे जिसको है संतुष्टि
जो भी है,जैसे भी है,जितना है पास तेरे
उसी मे ही संतुष्टि का भाव रख,निर्वहन करे ।
अति के लोभ मे आकर,अटपट मे ना फंसे
ऐसी कोई गलत कार्य ना करे,जिससे लोग हंसे
दिखावे की जिंदगी जीने के वास्ते
अक्सर हमसब पकड़ लेते है गलत रास्ते ।
परिणाम फिर तो निखलते है,बहुत बुरे
रह जाते है ख्वाब हमारे,सारे अधुरे
खुद के साथ,परिवार भी दुख मे रहते
खामोशी,खिजलाहट,गुस्सा घर मे है,फैल जाते ।
जगहंसाई तो होती ही हमारी,परिवार भी झुलसते
पराये को तो छोडो अपने भी,ताना है मारते
भले सीमीत संसाधन मे है,कष्ट ढेर सारे
लेकिन सुकून की जिंदगी जीने से नही है,परे ।
कुल मिलाकर सौ बातो की एक ही है बात
जो है तेरे पास,उसी के सहारे चले जिदगी के साथ
सहनशीलता,धैर्य, संयमित का करे अनुपालन
संतुष्टि से रहे,सुख का अनुभव कर,जीवन करे निर्वहन
चुन्नू साहा पाकूड झारखण्ड












