विधा – काव्य
हर मौसम हर दिन एक सितम है मेरे लिये
जी रहे है ये भी एक गम है मेरे लिये
दुआ मत करना ए रकीब बरास्ता जिंदगी के वास्ते
ये दुआ भी इंतिहाई बदग़ुमानी करम है मेरे लिये
उस दौर ए मुकाम के जानिब हम जीते है
जिल्लत का कड़वा घूँट भी हँसकर हम पीते है
इंतिहाई सितम के दौर में गम का पैमाना ही हम भूल गए
जख्म खुद के ही सहलाना हम भूल गए
खुदा ने जिंदगी क्या बक्शी मानो हिसाब बराबर कर रहा हो
कर्जा किसी जनम का था वसूल रहा हो
रहमत जिसकी हम मानते थे दरअसल वो उसकी अदालत थी
कम ज्यादा की सोची समझी एक अय्यारी अदावत थी
यकीं का यकीं के रास्ते अब जनाज़ा निकल गया
साया भी साथ तन का बेतलकल्लुस छोड़ गया
यकीं ए खुदा तुझ पर भी क्या करूं
मुआफ करना जिंदगी पर मरा तुझ पर कैसे मरूँ
जिसको तेरा तोहफ़ा समझा वो कफ़न निकला
आशियाने के परे कब्र का रकबा निकला
आशनाई जिंदगी की अब हवा हो गई
जीने मरने का कसम फांसला बन गई
जिये तो खूब जीना ना आया
तेरी दुनियाँ के लायक ना बन पाया
दुर्गति अब नसीब बन गई
जिंदगी एक झोंके के मानिंद फर हो गई
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र












