
विश्व हिन्दी दिवस हेतु
हिन्दी मेरे देश की भाषा,
देश को सबसे प्यारी है।
हिल-मिलकर यह सबमें रहती,
सारे जग में न्यारी है।।
इसकी शैली इसकी भाई,
इसके रंग अरु रुप हजार।
इसे आज तक जान न पाया,
कोई पूरा नर अरु नार।।
छन्द और रस, अलंकार से,
शोभित, उज्ज्वल यह होती।
यही काव्य, साहित्य का गहना,
इसमें भारत माँ सोती।।
हिन्दी-सा साहित्य नहीं है,
हिन्दी-सा नहीं भाव विमल।
हिन्दी-सा अनुपम नहीं कोई,
करदे सबको ये विह्वल।।
इसीलिए तो सबको प्यारी,
सदा रही अरु आज भी है।
इसको सदा सहेजे रखना,
इस पर सबको नाज भी है।।
सभी जगह व्यापक, बहती है,
ज्यों सुरसरि निर्मल धारा।
मज्जन पान कराके हरती,
अघ नर के, देती नारा।।
एक हिन्द है, एक राष्ट्र है,
एक वतन मेरा यारो।
उसमें हिन्दी एक भरी है,
इस पर कीचड़ मत डारो।।
देना तुम सम्मान इसे नित,
इसका मान बढ़ाओ सब।
सागर से भी यह गहरी है,
नभ में इसे पहुँचाओ अब।।
तभी हमारा जीवन होगा,
सफल, सार्थक, गरिमामय।
वो दिन कितना चमक बिखेरे,
होगी, झंकृत गायन लय।।
यही मुझे बस कहना था ये,
इसे नहीं गिरने देना।
शुद्ध, परिष्कृत रूप में इसको,
सबके सम्मुख रख देना।।
रचना-
पं० जुगल किशोर त्रिपाठी
बम्हौरी, मऊरानीपुर, झाँसी (उ०प्र०)











