
लाखों करोड़ों धोखेबाज़ों के बीच में रहने से तो अच्छा है कि हम अकेले रहें,
भूखा ही सही लेकिन हम अपने घर में रहेंगे और चैन सुकून से रहेंगे।
क्योंकि सही मायने में यही जीवन होता है क्योंकि जिसको जीना होता है,
वह लाखों करोड़ों का भीड़ नहीं खोजता है वह अकेले जीवन जीना जानता है।
चन्दे पासवान उर्फ अलबेला जी मधुबनी बिहार से,











