
राजकीय भाषा हमारी हिंदी
सब बोलियों की जननी है।
बेटी कहलाती संस्कृत की,
यह निज शब्दानुशासित है।
बावन अक्षरों की वर्णमाला
इसमें अद्भुत खेल रचाती है ।
गढ़ लेती है हर भावों को,
रस उसमें घोल लेती है।
शब्द शब्द से सुंदर भावाभिव्यक्ति
वाक्य विन्यास अलंकारों से अनुरक्ति।
करती हिंदी भावनाओं का श्रृंगार
झलकता हिंदी में शिष्टाचार अपार।
संस्कृति की सुगंध समेटे हिंदी
भक्ति भावना का अद्भुत संसार।
कबीर, तुलसी, रसखान, जायसी,
मीरा, के छंदों में मोहन का प्यार।
सब भाषाओं की जननी हिंदी
क्यों ना मैं अभिमान करूं।
जन-जन तक पहुंचे यह हिंदी,
क्यों ना मै इसका गुणगान करूं।
उर्मिला ढौंडियाल ‘उर्मि’
देहरादून (उत्तराखंड)











