ए दोस्त नाम मे तेरे अपना नाम मिलाते रहे
नामालूम कि खाक मे अपनी हस्ती मिलाते रहे
हम सपने तेरे मेरे साथ के दिन रात देखते रहे
वो आये सपना बनके अपनी ही नज़रों से ओझल रहे
हम अपने बरबाद इश्क का मातम ही मनाते रहे
वो अपने सपने कही ओर ही सजाते रहे
हम उनकी नज़रों मे खुद के वास्ते कशिश का दीदार करते रहे
फरेबी निगाहों से ही अपना दिल-ए-हाल दो चार करते रहे
ये मोहब्बत भी एक गहरा सागर है डूबते रहे
उनके ही हसीं सपनो मे कहीं खुद के लिये जगह तलाशते रहे।
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र











