
वर्षभर के व्यवहार में
कहीं मेरे शब्द कठोर हुए हों,
कहीं मौन ने चोट पहुँचाई हो,
कहीं अनजाने मेरा कोई व्यवहार
आपके मन में ठहर गया हो;
तो आज उसे अपने मन से विदा करने की
विनम्र अनुमति चाहती हूँ।
मनुष्य हूँ, भूलों से परे नहीं;
इसलिए क्षमा माँगने में संकोच नहीं।
और यदि आपकी कोई बात मेरे मन में
अनजाने ठहर गई हो,
तो उसे भी आज मुक्त करती हूँ।
आइए, मन पर जमा पुरानी परतें हटाएँ
और संबंधों को फिर से
निर्मल भाव से देखें।
मन-वचन-काय से हुए
समस्त अपराधों के लिए क्षमायाचना।
मिच्छामि दुक्कडम्।
छाया शाह ‘सख्य’ मुंबई(कच्छ)












