
नश्वर इस जग में सभी के चाहे बासंती रंग
जो जन्मा सो जाएगा …जाए कहां…नहीं पता किसी को
जाएंगी संग– कर्म-फल सुगंध।
बूटा कर्मों का बोया था जो तूंने कल
कब फलेगा… कल फलेगा… फल कब मिलेगा …
नहीं पता किसी को… कैसा होगा कल
बोया कर्म फलेगा निश्चित
इस जन्म फल मिल जाएं
या फल मिल जाए
आने वाले कल।
उस नियंता ने दी हैं आंखें…
जानबूझ कर फिर क्यूं बना तूं अंध
उस जग न कोई दबंग… उतर जाएं गे सब रंग
सब जियें वहां कर्मों के संग।
धुल जाएगा सब स्वांग
और काया पर रंगा ये रंग
कर्म फल में उगेंगे कांटे या मिलगी पुष्प सुगंध।
हे मानव !
मिली हैं आंखें फिर भी क्यूं है तूं अंध ।
बिन इच्छा के तूं जी ले
ये इच्छाएं ही उत्पन्न करें–जीव में अपने रंग।
इच्छाओं के वशीभूत हुआ जो…
वही डूब गया इच्छाओं की तरंग।
कर्म ही जीवन आधार… उस बिन न हो वैतरणी पार
कर्मों की नाव बना ….रास्ता देगी
भवसागर की हर धार।
कर्म फल जो चखें अब …
खट्टे-मीठे– कांटों संग…या संग मिली पुष्प सुगंध
भाग्य लिखा जाएगा… उस विधाता के हाथ जो नहीं तंग
जन्म लेते ही भाग्यशाली कहलाएगा
फैलेगी तेरे कर्मों की पुष्प सुगंध।
जब लिखा जाएगा तेरा जन्मांग…
जो रचा विधि ने —
कर्म और भाग्य चलेंगे संग
वक्त बदल दे जीवन की हर गति और तरंग ।
गीता में कहें हरि-” पार्थ उठा गांडीव-निषंग “
सद् गति निश्चित …. जिया यदि तूं धर्म के संग।
महेश शर्मा- करनाल












