
आँखों में पानी भरे जनता भूखी आज,
सूख रही धरती यहाँ ना वर्षा की आस,
कोई चारा चर गया बेंच रहा कोई देश,
डाकू घूमे हर शहर धर नेता का बेश।
सोसल मीडिया कर रहा है छुपकर वार,
जनता आँसू पी रही महँगाई की मार,
रोटी कपड़ा मकान में उलझा है संसार,
काम धाम सब ख़त्म हैं हो गए बेरोज़गार।
घोर निराशा छा रही, चारों ओर अंधकार,
गुंडे माफिया बढ़ रहे होता है सत्कार,
ज्ञानी बनकर घूमते करते धोखा लूट,
बाहुबली का हर बड़े से रिश्ता बना अटूट।
दुष्टों के संग मेल है दुर्जन संग निवास,
इच्छाधारी नाग वे मणी है उनके पास,
मन काला तन श्वेत है भाषण लच्छेदार,
ऊपर से दिखते भले करते अत्याचार।
वाणी में संयम नहीं, निरंकुश बर्ताव,
तन मन में है भरा अहंकार का भाव,
करे दलाली आज, हो कल मालामाल,
हिंसा अपराध का फैल रहा है जाल।
प्रजातंत्र के नाम पर कागा मारें चोंच,
कूटनीति के खेल हैं नही है अच्छी सोंच,
आदित्य है बिक रहा, है पैसे का मोल,
जीवन की क़ीमत नहीं दौलत ही अनमोल।
डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ











