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क्षरण

धीरे धीरे क्षरण
देह का देख रहें हैं
जीवित ही हम मरण
देह का देख रहें हैं

जन्मों के संजाल
काल से हैं डँसते
कर्मों के जंजाल
मोह के पल रचते

होता है क्या वरण
अभी हम देख रहें हैं
जाना है किस शरण
अभी हम देख रहें हैं

विचलन की सीमा
तक जा जा कर लौटे
फिसलन को कुछ
बाँट दिए सिक्के ख़ोटे

क़र्ज़ उधारी गिरता
शेयर देख रहें है
बाज़ारों में मचती
दहशत देख रहें हैं

गिरवी धरी गिरोहों में
अस्मिता घरों की
बाज़ी पलटी नहीं भी
पलटी बुरे दिनों की

लाता कैसे वक़्त
तबाही देख रहें है
बारिश के संग क़िस्मत
बहती देख रहें हैं
के वी

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