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राधा -प्रेम की पराकाष्ठा

राधा केवल एक नाम नहीं, एक अनुभूति है, एक भाव है जो शब्दों से परे है।
जहाँ प्रेम अपनी सीमा लांघ कर भक्ति बन जाता है, वहीं राधा का जन्म होता है।
श्रीकृष्ण यदि संसार के कण-कण में व्याप्त ईश्वर हैं, तो राधा उस ईश्वर के हृदय में बसने वाली करुणा हैं।
वेदों ने जिसे अलौकिक कहा, उपनिषदों ने जिसे अनिर्वचनीय कहा, भक्तों ने उसी को राधा कहकर पुकारा।
राधा का अर्थ है – आराधना करने वाली, और जो आराधना करे वह तो स्वयं आराध्य बन ही जाती है।
ब्रज की धूल में आज भी राधा के नूपुरों की ध्वनि सुनाई देती है।
यमुना की लहरें आज भी किनारे से टकरा कर राधे-राधे ही कहती हैं।
कदम्ब के हर पेड़ पर आज भी किसी अनदेखे हाथ ने राधा-कृष्ण नाम लिख रखा है।
बरसाने की गलियों में रंग नहीं, राधा का अनुराग उड़ता है।
वृंदावन का कण-कण कहता है – राधा के बिना कृष्ण अधूरे हैं।
राधा ने कृष्ण से कभी कुछ माँगा नहीं, और कृष्ण ने राधा को कभी भुलाया नहीं।
यह कैसा संबंध है जहाँ मिलना ही विरह है और विरह में ही मिलना है?
राधा का प्रेम बंधन नहीं, मुक्ति है।
वह अधिकार नहीं जताती, समर्पण सिखाती है।
वह ईर्ष्या नहीं करती, प्रेम का विस्तार करती है।
कृष्ण ने गीता में कहा – मैं ही सब कुछ हूँ, पर राधा के सामने आते ही वे स्वयं प्रेम में सब कुछ भूल जाते हैं।
द्वारका के राजा कृष्ण, मथुरा के योगेश्वर कृष्ण, पर बरसाने में आते ही वे केवल राधा के किशोरी बन जाते हैं।
राधा का प्रेम सांसारिक प्रेम जैसा नहीं है जो पाने पर घट जाए और न पाने पर द्वेष बन जाए।
राधा का प्रेम तो वह दीपक है जो जल कर भी रोशनी देता है, मिट कर भी सुगंध देता है।इसलिए तो कृष्ण का नाम पहले नहीं आता, पहले राधा आती है –
राधे-कृष्ण, राधे-श्याम।
हे राधे! तुम्हारी आँखों में जो यमुना है, उसी में तो कृष्ण डूबना चाहते हैं।
तुम्हारी मुस्कान में जो वृंदावन है, वहीं तो कृष्ण बसना चाहते हैं।
तुम्हारे एक आँसू में इतनी शक्ति है कि वह द्वारिकाधीश के सिंहासन को हिला दे।
तुम्हारे मौन में वह गीता है जो शब्दों में कही ही नहीं जा सकती।
तुम प्रेम की अंतिम परिभाषा हो, जहाँ प्रेमी और प्रेम एक हो जाते हैं।
आज की स्त्री को राधा से सीखना चाहिए – कैसे कोमल होकर भी सशक्त रहा जाता है।
कैसे प्रेम में झुक कर भी अपना स्वाभिमान नहीं खोया जाता।
कैसे प्रतीक्षा को भी उत्सव बनाया जाता है।
कैसे विरह को भी साधना बनाया जाता है।
राधा ने सिखाया कि प्रेम में रोना दुर्बलता नहीं, पवित्रता है।
राधा कभी मंदिरों में कैद नहीं हुई, वह तो भक्तों के अश्रुओं में बहती है।
राधा कभी मूर्ति में नहीं समाई, वह तो मीरा के भजन में गाती है।
राधा कभी इतिहास में नहीं लिखी गई, वह तो हर प्रेम करने वाले के हृदय में लिखी है।
जब भी कोई निःस्वार्थ प्रेम करता है, वहाँ राधा पुनः जन्म लेती है।
जब भी कोई अपने प्रेम के लिए स्वयं को मिटा देता है, वहाँ राधा मुस्कुराती है।
इसलिए हे राधे, हमें वर दो कि हमारा प्रेम भी तुम्हारे जैसा पवित्र हो।
हमारा मन भी तुम्हारे जैसा निश्छल हो।
हमारी भक्ति भी तुम्हारी जैसी अटूट हो।
हम भी प्रेम में लेना नहीं, देना सीखें।
हम भी कृष्ण को बाहर नहीं, अपने भीतर खोजें।
बरसाने वाली राधा रानी, कृपा की महारानी।
तेरे चरणों में झुके तो सारा अभिमान मिट जाए।
तेरे नाम से ही तो पत्थर भी पिघल कर यमुना बन जाए।
जो एक बार सच्चे मन से राधे कह दे, उसे फिर कृष्ण को पुकारना नहीं पड़ता।
कृष्ण स्वयं दौड़े चले आते हैं, उस राधा नाम की डोर से बंधे हुए।
राधा और कृष्ण दो नहीं हैं, एक ही प्राण के दो विस्तार हैं।
जैसे धूप और सुगंध, जैसे दीया और बाती, जैसे शब्द और अर्थ।
उन्हें अलग करके देखोगे तो कुछ समझ नहीं आएगा।
उन्हें एक करके देखोगे तो सारा संसार समझ आ जाएगा।
यही तो राधा तत्व का रहस्य है।
अंत में बस इतना ही राधे-राधे!
के वी

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