
कविता
हिम्मत को विराम ना दो
बढ़ते हुए रहना है निरंतर
कदमों को विश्राम ना दो,
कुछ कर गुजरने वाले लोगों से ही आज का उजियारा है,
अपने होंसले से ही कुछ लोगों ने कदमों तले विफलताओं को कुचला है,
जो मेहनत करते हैं दिन और रात,
सफलताएं उनके कदम चूमती है,
होंसले की उड़ान है यह,
उड़ान परिंदों के होंसलों से सीखो,
इसे कभी कोई नाम ना दो ,
हिम्मत को विराम ना दो,
खुलें आसमान में बादल से आगे निकल जाते हैं पंछी,
इनसे सीखो कभी भी तुम हिम्मत को विराम ना दो,
ब़तख के बच्चों को तैरना नहीं सीखाया जाता,
चातल के बच्चों को जल थल में रहना नहीं सीखाया जाता,
मछली के बच्चों को तैरना नहीं बताया जाता,
इनकी परवरिश को कोई नई पहचान ना दो,
हिम्मत को विराम ना दो ।।
अशोक सुमन भवानी मंडी (राज.)












