
विधा : पद्य
कुछ पट रहे हैं ,
कुछ छॅंट रहे हैं ।
जीवन के दिन ,
तो कट रहे हैं ।।
चाहे हों पस्त हम ,
चाहे हों स्वस्थ हम ,
हो आचार जैसा ये ,
क्यों नहीं मस्त हम ।
कोई न ठट रहे हैं ,
मस्तिष्क चट रहे हैं ,
हों चाहे जैसे भी हम ,
आयु तो घट रहे हैं ।
चाहे हों अपकार में ,
चाहे हों उपकार में ,
चाहे हों तकरार में ,
चाहे क्यों न प्यार में ।
दिनरात खट रहे हैं ,
धुन निज डट रहे हैं ,
उम्र नहीं बॅंट रहे हैं ,
नित्य उम्र घट रहे हैं ।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार












