
विधा : पद्य
अल्फाजों पे लगा लगाम ,
बोल वचन में न लगे दाम ,
असहज समय को देख ,
हिम्मत को न दो विराम ।
ऐसे असहज समय तुम ,
भूल से असहज न होना ,
हो गए गर असहज तुम ,
पड़ सकता है तुम्हें रोना ।
सुबह दोपहर औ शाम ,
देते रहो सदा ही पैगाम ,
सोना सज्जन साधुजन ,
सबका सदा करें प्रणाम ।
विस्मित कभी होना नहीं ,
पर्वत भी मिले खड़ा कहीं ,
चलते रहो तुम सीना ताने ,
संकट धैर्य से बड़ा नहीं ।
स्वर्ग नर्क या क्यों न धाम ,
विशेष हों या कोई आम ,
हिम्मत को न दो विराम ,
चाहे शहर हो या हो ग्राम ।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।












