
आलेख: भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक के 16 दिन पितृपक्ष कहलाते हैं। हिंदू मान्यता में ये दिन हमारे पूर्वजों को समर्पित हैं। गरुड़ पुराण कहता है – “पितृ प्रसन्न तो देव प्रसन्न।” जिनके कारण हमारा अस्तित्व है, उनके प्रति कृतज्ञता ही पितृपक्ष है।
पितृपक्ष शोक नहीं, सम्मान का पर्व है। इस दौरान हमारे तीन मुख्य कर्तव्य हैं। स्मरण और श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। अपने पितरों को याद करना, उनके नाम से तर्पण करना। यह केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि यह कहना है – “आप थे तो हम हैं।” संयमित जीवनचर्या का पालन करना चाहिए। इन 16 दिनों में सात्विक रहना, मांस-मदिरा, लहसुन-प्याज से बचना, ब्रह्मचर्य का पालन और नए कार्य, मांगलिक कार्य न करना। हमे क्षमा प्रार्थना जरूर करनी चाहिए। यदि जाने-अनजाने हमने पितरों का अपमान किया हो तो उनसे क्षमा मांगना आवश्यक है।
पितरों की मुक्ति हेतु समुचित विधि-विधान के अनुसार कर्म करना चाहिए। विधि विधान के अनुसार तर्पण करना चाहिए। सुबह स्नान के बाद दक्षिण दिशा की ओर मुख करके काले तिल, जल और कुशा से पितरों को जल अर्पण करना। “ॐ पितृभ्यो नमः” मंत्र के साथ पिंडदान अवश्य करना चाहिए। पके हुए चावल, जौ, तिल और शहद मिलाकर पिंड बनाना। मान्यता है कि पिंड शरीर का प्रतीक है और इसे ग्रहण कर पितर तृप्त होते हैं। गया, प्रयाग, पुष्कर और हरिद्वार में पिंडदान का विशेष महत्व है।
ब्राह्मण या किसी गरीब को को भोज देना चाहिए। अपने पितर की तिथि पर ब्राह्मण या गरीब को भोजन जरूर कराना चाहिए, उन्हें पितर स्वरूप मानना चाहिए। यदि तिथि याद न हो तो सर्वपितृ अमावस्या को श्राद्ध करना।दान-पुण्य का महत्व शास्त्रो में विस्तार से बतलाया गया है। पितृपक्ष में किया गया दान पितरों तक सीधा पहुँचता हैं। अन्न दान सबसे पवित्र दान बताया गया है। सबसे बड़ा दान गरीबों को भोजन कराना है। वस्त्र दान हमको अपनी क्षमता के अनुसार अवश्य करना चाहिए। धोती, गमछा का दान। गौ दान / गौ ग्रास सबसे बड़ा पुण्य का कार्य कहा गया है। गाय को चारा खिलाना। गाय में सभी पितर वास करते हैं। जल दान सबसे बड़ा और उत्तम दान माना गया है। प्याऊ लगवाना, घड़ा दान करना, क्योंकि पितर प्यासे होते हैं। दीप दान करना सर्वोत्तम माना जाता है। दक्षिण दिशा में शाम को सरसों के तेल का दीपक जलाना।
निष्कर्ष: पितृपक्ष अंधविश्वास नहीं, कृतज्ञता का विज्ञान है। हम जो दान करते हैं, वह समाज में जाता है और हमारे पितरों का नाम अमर करता है। सच्चा श्राद्ध है – अपने पितरों के अधूरे अच्छे कार्यों को पूरा करना।
मुन्ना राम मेघवाल।
कोलिया,डीडवाना,राजस्थान।












