
हिंदी न केवल भारत की सांस्कृतिक धरोहर है, बल्कि यह विश्व मंच पर भारत की पहचान को भी सशक्त बनाती है। इसमें हमारी वाक् सत्ता है हमारी संस्कृति है और यही हमारी आत्मा का स्वर है।
भाषा और संस्कृति का परस्पर घनिष्ठ संबंध है। भाषा विचार विनिमय का साधन ही नही बल्कि यह हमें सोचना भी सिखाती है। हमारे सारे बुद्धि, वैभव,कला, साहित्य, राजनैतिक,आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सरोकार भाषा से निर्मित हुए हैं। हमारी मातृभाषा हिंदी सनातन संस्कारों की भव्यता का दर्पण है। इसमें हमारी आकांक्षाओं की दिव्यता सन्निहित है।
भषा बोलने सीखने से पहले अक्षर ज्ञान तक मनुष्य अपनी दुधमुंही बोली में जीता है। जिसे वह बिना प्रयास ही अर्जित कर लेता है। मनुष्य बोली अपने पूर्वजों से सीखता है। वह परम्परागत एवं अर्जित दोनों होती है। जीवन की भाषा ‘बहते नीर’ की तरह सदा प्रवाहित होती रहती है।
भाषा की छोटी इकाई बोली है। बोली का लेखन, साहित्यिक प्रयोग ,व्याकरणनिष्ठता आदि से कोई संबंध नहीं होता। भाषा की तरह इनमें व्यापकता अथवा स्थिर रूप के भी दर्शन नहीं होते। इसकी रूप-रचना और उच्चारण में स्थानीय प्रभाव को लक्षित किया जा सकता है। आज स्थानीय बोलियां राजनैतिक और सांस्कृतिक प्रभुत्व में आकर मृतप्राय हो चुकी हैं।
हिंदी भाषा को सशक्त बनाने के लिये जिस तरह हम विदेशज शब्दों को अपना रहे हैं उसी तरह देशज शब्दों को भी संग्रहीत करना होगा। बोलियों में मिठास है। भारत की माटी की सौंधी सुगंध है। यदि हम छोटे भाई की जगह कणसा भाई लिखें तो बात ही कुछ और है।
मनुष्य के मानसिक विकास के लिए मातृबोली उतनी ही आवश्यक है जितनी कि बच्चे के शारीरिक विकास के लिए मां का दूध।
गोवर्धन थपलियाल दिल्ली












