
विधा – काव्य
भौतिकता की आंधी में अहम हावी हो गया
रिश्ते नातों पर झूठी शानोशौकत का नशा चढ़ गया
आपसी प्रेम आधुनिकता के प्रभाव में सिमट गया
परिवार अब झूठे अहम की बलि चढ़ गया
एक ही घर के आंगन में क्लेश की दीवार खींच गई
प्यार मोहब्बत के संसार को नफरत की आग निगल गई
झूठे अहम ने इंसान को शैतान बना दिया
चार कमरों का मकान दो कमरों में तब्दील हो गया
हाल चाल कोई किसी का लेनेवाला अब रह नहीं गया
सुना आँगन सुना कमरा सुना संसार सारा हो गया
प्यार मोहब्बत अपनापन बदलते दौर की बलि चढ़ गया
रिश्ते नातों पर अब व्यावसायिकता का आवरण ढंक गया
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र











