Uncategorized
Trending

राष्ट्रकवि दिनकर : मशाल ज्योति अखंड ज्ञान की

राष्ट्रकवि दिनकर, तुमने हिंदी जग में,
जलाई मशाल ज्योति अखंड ज्ञान की।
अन्याय के विरुद्ध उठी कलम तुम्हारी,
बनकर अजेय धार महान प्राण की।।

‘दिल्ली’ लिख शासन को तुमने झकझोरा,
‘कुरुक्षेत्र’ में गूँजा युग का पुकार।
‘रश्मिरथी’ की रचना अमर कर गई,
‘उर्वशी’ सुधा रस का अनुपम हार।।

‘द्वन्द गीत’ में जीवन रस तुमने भरा,
‘प्रणभंग’ से हुंकार गगन तक गई।
‘संस्कृति के चार अध्याय’ से सिखाया,
भारत की गाथा हर दिशा तक गई।।

‘इतिहास के आँसू’ ने स्वर पाया,
‘धूप-धुँआ’, ‘नीम पत्ते’ बोल उठे।
‘वट-पीपल’, ‘रैती के फूल’ खिले,
गीतों की माला में मोती जुड़ उठे।।

‘हारे के हरिनाम’ से पीड़ा जलाई,
रोटी छिनने की व्यथा तुमने कही।
‘शुद्ध कविता की खोज’ में जीवन ढला,
सत्य-धर्म की ज्योति सदा तुमने गही।।

तिरुपति धाम में ‘मृत्युतिलक’ सा पाया,
‘सीपी और शंख’ बने तेरे निशान।
उत्तर में उगा था दिनकर दीप सम,
दक्षिण में अस्त हुआ वह महान।।

धन्य सिमरिया भूमि, जहाँ जन्म तुम्हारा,
धन्य हमारा भारत, गौरव महान।
आज भी पुकारे जग हे विभापुत्र,
उजली अग्नि बन दे फिर प्रज्ञा-प्रदान।।

भारत को ‘कुरुक्षेत्र’ में है प्रतीक्षा,
आओ पुनः बनकर परशुराम महान।
हे ओजकवि! शत-शत नमन तुम्हें,
तेरी अमर गाथा करे जग सम्मान।।


डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *