
ईंटों से मकान बनता है,
लेकिन घर प्रेम से बनता है—
और अक्सर उस प्रेम का चेहरा
एक स्त्री होती है।
वह गृहिणी,
जो सबसे पहले जागती है
और तब विश्राम करती है,
जब दिन की सारी हलचल
आखिरकार खामोश हो जाती है।
उसके काम की
न कोई हाजिरी लगती है,
न वेतन-पर्ची मिलती है,
न सप्ताहांत होता है,
और न ही काम खत्म होने का
कोई निश्चित समय।
वह घर के हर सदस्य की जरूरत याद रखती है,
लेकिन कई बार
अपनी जरूरतें भूल जाती है।
हर सलीके से सँवारे गए घर के पीछे
शायद अनगिनत ऐसे सपने होते हैं,
जिन्हें उसने चुपचाप टाल दिया—
कोई करियर, जिसे उसने पीछे छोड़ दिया,
कोई जुनून, जिसे उसने थामकर रखा,
कोई दोस्ती, जिसे वह समय न दे सकी,
और कुछ पल विश्राम के,
जिनके बिना जीने की
उसे आदत हो गई।
घर सँभालते-सँभालते
वह केवल घर नहीं बनाती,
वह रिश्तों को जोड़ती है,
अपनों को संवारती है,
और अपनी ही इच्छाओं को
कई बार चुपचाप किनारे रख देती है।
इसलिए गृहिणी के त्याग को
सिर्फ कर्तव्य कहकर छोटा न करें—
उसे भी विश्राम का अधिकार है,
अपने सपनों का अधिकार है,
और अपने लिए जीने का भी अधिकार है।
डॉ. रूपाली गर्ग
मुंबई, महाराष्ट्र











