
दरअसल समझौता और उसूल के बीच की रस्सी पर चलने का नाम है।
जब तक आपके उसूल ज़िंदा हैं, आप समझौता करते हैं – हालात से, वक्त से, अपनों से।
जिस दिन उसूल मर गए, समझौता सौदा बन जाता है।
फ़ितरत कभी नहीं बदलती। इंसान की फ़ितरत ही उसका सबसे सच्चा आईना है। हम जिसे माफ़ करना समझते हैं, वो अक्सर फ़ितरत को नज़रअंदाज़ करना होता है।
इसी फ़ितरत की वजह से अपने कब बेगाने हो जाते हैं, पता ही नहीं चलता। बेगाने वो नहीं जो दूर चले गए, बेगाने वो हैं जो पास रह कर भी कभी अपने थे ही नहीं। फिर शुरू होता है दिखावा रिश्तों में दिखावा आते ही नक़ाब पहनने पड़ते हैं। हर नक़ाब के साथ हम थोड़ा-थोड़ा खुद से दूर होते जाते हैं।
और आखिर में हर नक़ाब के पीछे थोड़ी सी कालिख बच ही जाती है।
ये कालिख चेहरे पर नहीं, नियत पर लगती है। चेहरे की कालिख धुल जाती है, नियत की नहीं।
जो अपनी फ़ितरत से समझौता नहीं करता, उसे दुनिया बेगाना कहती है।
और जो हर बात पर समझौता करता है, वो एक दिन खुद को ही नक़ाब के पीछे खो देता है।
इसलिए उसूलों पर टिके रहना दिखावा नहीं, बल्कि खुद पर लगी कालिख से बचना है।
के वी












