
दोहे
शीर्षक — अनन्त आस्था का पर्व
अनन्त डोर में बँधें, श्रद्धा के शुभ भाव।
हरि की कृपा बरसती, मिटे हृदय का घाव।।
शेषनाग की शय्या पर, विष्णु विराजें आज।
भक्त हृदय में प्रेम का, खिले अनोखा राज।।
चौदह गाँठों में बँधा, चौदह लोक विधान।
अनन्त देव के नाम से, पावन हो अभिमान।।
दूध-दूर्वा फल-फूल से, सजे भक्ति का थाल।
मन-मंदिर में जगमगे, श्रद्धा का दीपक लाल।।
सुख-संपदा की कामना, लेकर आएँ द्वार।
अनन्त कृपा से मिटे, जीवन के संताप।।
मन के सारे द्वेष को, आज करें हम दूर।
प्रेम-सद्भावों से सजे, जीवन का हर नूर।।
अनन्त चतुर्दशी कहे, रखो सत्य का मान।
सेवा, संयम, प्रेम से, ऊँचा हो इंसान।।
अनन्त प्रभु की भक्ति में, झुके सभी के शीश।
मंगलमय हो हर घड़ी, सुखमय हो जगदीश।।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार











