
वो सामने थी तो कुछ भी अजीब लगता ना था,
वो चली गई तो कोई भी रंग वैसा ना था,
ना जाने किसलिए अच्छा सा लगता था उसको देखना,
कोई रिश्ता ना था,फिर भी ये मन अनमना था,
मैंने कभी उसे चाहा ये बात भी कह ना सका
मगर उसके सिवा कुछ सोचता भी तो क्या था,
वो अपने हिस्से का सफर मुकम्मल करके गई,
मेरे हिस्से में एक सवाल बचा था,
वो आज भी याद नही बस हवा बदलती है,
कभी लगता है जैसे वो यहीं कहीं खड़ी है,
ना मैंने उसे रोकना चाहा ना कुछ कहने की हिम्मत,
शायद उसकी ख़ुशी मे ही मेरी खुशी छिपी थी,
अजीब बात है वो मेरी कहानी थी ही नही,
फिर उसके बाद मेरी रात इतनी लम्बी क्यों थी,
मैं उसे क्या कहूँ, ख़्वाब, आदत या बस एक चेहरा
जिसे नाम देना चाहा,वही नाम से परे था।
के वी













