
उजास केवल शब्द नहीं, एक भाव है,
अंधेरों में जलता एक चिराग है।
जहाँ निराशा का घना अंधेरा हो,
वहाँ उम्मीद का दिया जलाना,
गिरते हुए को हाथ बढ़ाना,
बुझे दिलों में ज्योति जगाना,
यही तो है, जीवन में उजास भरना।
उजास माने सूरज की पहली किरण,
उजास माने ज्ञान का निर्मल दर्पण,
उजास माँ की ममता का आँचल है,
उजास माने गुरु का दिया संबल है।
दीया बनो, खुद जलो पहले,
तब औरों को राह दिखाओगे,
खुद में उजाला भर लो इतना,
कि अंधकार मिटा सकोगे।
न नफरत, न ईर्ष्या, न कोई छल हो,
मन में सबके प्रति निर्मल जल हो,
शब्दों में मिठास, कर्म में सच्चाई,
यही उजास की है सच्ची गहराई।
तो आओ हम सब प्रण करें आज,
न अंधेरा फैलाएँ, न मन में रखें नाज,
हर दिल में एक दीप जला दें,
मानवता के पथ उजला कर दें।
आदित्य यही है सच्चा जीवन दर्शन,
अंधकार हटाकर, उजास भरन।
डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ













