
जिसने लहू से सींचा था, वो बाग पुराना छूट गया,
बच्चों की खातिर जिए मगर, वो साथ सुहाना छूट गया।
ये वृद्धाश्रम की दीवारों से, अपनो की सिसकी आती है।
दुनिया जीती, सब पा लिया, बस माँ का आँचल छूट गया।
सूखे होंठों से आज भी वो, बस लंबी उम्र की दुआ देते,
बेटा कहता ‘फुरसत नहीं’, वो खत अल्मारी में रख देते।
वो पहला जूता लाने में, पिता की चप्पल घिस गई,
तुम्हें बड़ा अफ़सर बनाने में, माँ की जवानी पिस गई।
आज उसी माँ के हाथों की, सूखी रोटी भी भारी है,
औलाद के बड़े बंगले पर, एक छोटी कोठरी भारी है।
तस्वीरें जो दीवार पे थीं, वो सब डस्टबिन में डाल दीं,
पोते ने पूछा ‘दादा कहाँ?’, तो झूठी बात उछाल दी।
‘वो तीरथ करने गए हुए’, कहकर मन को बहलाते हैं,
जो खुद को मॉडर्न कहते हैं, वो संस्कारों को जिंदा जलाते हैं।
जिस गोद में हंसना सीखा था, उस गोद को तन्हा छोड़ दिया,
कागज़ के चंद नोटों के लिए, साए से रिश्ता तोड़ दिया।
त्योहारों पर जब आश्रम में, कोई मिलने नहीं आता है,
तब कांपते हाथों से कोई, पुराना कुर्ता सहलाता है।
दवाइयों की शीशी में अब, वो अपनी मौत टटोलते हैं,
शाम ढले जब सन्नाटा हो, तो रो-रोकर आँखें धोते हैं।
ऐ वक्त के अंधे इंसानों, तुम भी तो कल बूढ़े हो जाओगे,
जो बीज बोया है नफरत का, वही कल तुम भी काटोगे।
रीना पटले शिक्षिका
शासकीय हाई स्कूल ऐरमा कुरई
जिला सिवनी मध्यप्रदेश













