
हे मानव! चार दिन की है जिंदगी
क्यों गुमान व्यर्थ का करता है
एक दिन यह शरीर मिट्टी में मिल जाना है
पहला दिन तू धरती पर आया
दूसरा दिन खाया पिया खेला
तीसरा दिन पढ़ -लिख कर कमाया
चौथा दिन अकेला हो गया
इन चार दिनों में तू अच्छा कर्म कर
भूखों को खाना खिलाओ
प्यासे को पानी पिलाओ
सबसे मोहब्बत करो
किसी के दिल में तू बस जा
तभी समझो तुम्हारा जीवन संवर गया
जीवन को खुशी से जी लिया
समय को तुमने व्यर्थ नहीं है गंवाया
गाड़ी, बंगला, कोठी, पैसा सब कुछ यहीं छोड़ कर जाना है
तेरे संग कुछ नहीं जाएगा
हे मानव! ध्यान से सुनो
करते चलो शुभ कर्म
यही पूंजी है तेरी जो तेरे साथ जाएगी
ऊपर वाले के दरबार में यही अर्जी जाएगी
डॉ मीना कुमारी परिहार













