
भीड़ खड़ी है चारों ओर, फिर मन क्यों चुपचाप,
अपनों के होते हुए भी, लगता जग बेगाना-सा।
हँसते चेहरों के पीछे भी, कितने दर्द छिपे हैं।
मन के भीतर जाने कितने, आँसू चुपचाप बहे हैं।
बात कहें तो कौन सुनेगा, कौन समझ पाएगा,
दर्द हृदय का कौन बाँटकर, अपना बन जाएगा।
कभी तन्हा बैठा मन अपने, बीते पल गिनता है।
यादों की आहट सुन-सुनकर, धीरे-धीरे हँसता है।
रिश्तों की भीड़ में अक्सर, मन सूना हो जाता,
पास खड़े इंसानों में भी, कोई पास न आता।
शब्द अधूरे रह जाते हैं, भाव मूक हो जाते।
आँखों में सावन लेकर भी, अधर नहीं कुछ कहते।
पर जीवन की राह कभी भी, थमती नहीं निरंतर,
रात ढले तो भोर खिलाती, आशा का सुंदर स्वर।
तन्हा मन को समझाना है—यह समय भी ढल जाएगा।
सूनी राहों पर कोई फिर, दीप नया जलाएगा।
अपने भीतर शक्ति जगाकर, आगे बढ़ते जाना।
दुःख की धूप में आशा का, शीतल वृक्ष लगाना।
जीवन चाहे मौन करे, विश्वास नहीं खोना।
कल की उजली किरणों खातिर, आज न खुद को रोना।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार













