
।। करवाचौथ।।
सांध्य गगन की थमी तपन है,
चंद्र-किरण को विकल मनन है,
मौन साधना में लीन सुहागन,
प्रिय दर्शन को आतुर नयन।।
कंठ मरुस्थल सा सूखा है अब,
बुझ गई भूख, बस प्यास ही प्यास है,
तड़प रहा मानस, झुलस रही काया,
पर अडिग प्रेम का ये विश्वास है।।
सज गई थाली, दीप जलाया,
गौरी-गणेश का ध्यान लगाया,
मंगल गीतों की गूंज उठी अब,
अंचल में श्रद्धा का रूप समाया।।
करवे का जल साक्षी बनता,
अटूट सुहाग की मन्नत लाया,
धैर्य और भक्ति के इस क्षण में,
मन ने विरह का शोक मिटाया।।
नभ में शशधर की सुधि लागी,
छलनी की ओट से ज्योति जागी,
देखा प्रियतम का मुख भोला,
सदियों की व्याकुलता भागी।।
शरद पूर्णिमा सा चमका नभ,
रजनीपति ने आशीष लुटाया,
नयनों ने नयनों को चूमा,
मिलन का पावन अनुपम पल आया।।
पिया-हाथ से प्रथम घूंट जल,
तृप्त हुई यह व्याकुल काया,
अमृत रस सा कंठ में उतरा,
प्रेम का मधुर वितान बिछाया।।
शीश झुका कर चरण छुए जब,
अखंड सौभाग्य का वर पाया,
सफल हुई यह कठिन साधना,
जीवन में फिर अनुराग समाया।।
रजनी कुमारी
लखनऊ उत्तर प्रदेश













