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नशा

विधा : पद्य


नाम होता है जिसका नशा ,
जिनके अंतर्मन में है बसा ।
होता उसका है ये तो खसा ,
करता उसका दशा दुर्दशा ।।
दुर्दशा की चिंता करे नहीं ,
दुर्दशा ने ही उसको डॅंसा ।
गया हर्ष मुहल्ले से उसके ,
व्यंग्यमय हॅंसी सबने हॅंसा ।।
सम्मान से सरोकार नहीं ,
सर्वत्र मिलता तिरस्कार ।
नशे में जब गंदगी लेटता ,
समझता सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार ।।
वाणी हिंदी अंग्रेजी मिश्रित ,
उसी में ये संस्कृत श्लोक ।
स्वयं बनता सम्राट चक्रवर्ती ,
जिसके हाथ लोक त्रैलोक ।।
देवलोक को पराधीन समझे ,
पाताललोक करता है राज ।
स्वयं को समझे वीर बहादुर ,
स्वयं पर ही करता नाज ।।

अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।

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