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वो जोर जोर से चिल्लाती है जो,

कविता

वो जोर जोर से चिल्लाती है जो,

चिहुंक कर चिख चिख के घर को अखाड़ा बना देने वाली,

आज चुप चाप मौन है,
घर में सन्नाटा पसरा हुआ है,

इधर उधर घूमती रहती है जो मुस्कराती हुई ,
सजी धजी हुई सुंदर सूरत वाली कौन है ,

जिसने घरेलू महिला बन कर
घर को मंदिर बना दिया है ,

मंजूरी दी है घर में सभ्यता को और शिक्षा का विकास किया विचार जिस तरह से तैयार किए हैं यहां पर यह कौन है,
जो
आज मौन है

संवाद सूत्र निकाल कर बताएं कि आप जल्दी से जल्दी घर आ जाना और फिर मुझे प्यार से दर्श पाऊं मैं, तो चरणों में अर्पित हों जाने देना,

थाली में पुजा का दिया जलाएं रखुंगी,

तुम्हारे इंतजार में दहलीज़ पर खड़ी रहुंगी ,

तुम्हारी आंखों में सपने सजने देना

पहले चांद के दर्शन कर अर्क चढ़ा कर लम्बी उम्र की चौथ मां से आशिर्वाद लुंगी,

जिंदगी भर शोर मचा देने वाली ममता विद्यमान जिसमें है,
वो आज बहुत सुन्दर सोलह श्रृंगार से सजी धजी हुई मेरे पास है वो मेरी हम सफ़र की जीवन संगिनी है ।।

अशोक सुमन भवानी मंडी (राज.)

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