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वास्तविक ज्ञानी

विधा – काव्य

पर्याप्त नही होता गर आप हो किताबी ज्ञानी
हकीकत को जाने येही है ज्ञान की निशानी

सच को दिखाना आज कोई खेल नही
जो उसे आत्मसात करे उसका कोई मेल नही

जिसने भोगा उससे पूछों उसकी कहानी
कुछ हासिल नही होगा बनके मिथ्या अभिमानी

कवि हूँ मुख पर माँ सरस्वती की वाणी है
सत्य से परे नही हो सकता मेरी कलम ही इसकी अधिकारिणी है

कलम सम्मान की भूखी नही होती
कलम सत्य की कसौटी होती है

कलम मानवीय सन्तोष की मोहताज नही होती
कलम हमेशा सत्य की आवाज होती है

कवि महिमामंडन नही करता
कवि झूठ का खण्डन करता है

दुनिया है क्या समझेगी इस ज्ञान को
क्योंकि हर एक ने बेच दिया अपने ही ईमान को


संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र

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