
टहनियाँ टूट जाती हैं,
तना मजबूत होता है,
पत्तियाँ गिरते हुए बोलीं,
जड़ों से आखिर कौन दूर होता है?
आज विश्व में चारों ओर फ्रांस, जर्मनी, ईरान, इज़राइल आदि देशों में युद्ध और संघर्ष की स्थिति बनी हुई है। दूर तक, जहाँ तक नज़र जाती है, युद्ध ही युद्ध मचा हुआ है। हालाँकि, इस प्रकार के हालात भारत में भी लागू करने की कोशिश की जा रही है, पर अभी यह संभव नहीं हुआ है।
आए दिन विपक्ष एवं अन्य राजनीतिक दलों के लोग अपने मतानुसार आम जनता को साथ लेकर नारेबाज़ी के माध्यम से सत्ता परिवर्तन की माँग करने के लिए जी-तोड़ मेहनत कर रहे हैं, ताकि सत्ता में परिवर्तन हो। पर मुझे नहीं लगता कि अभी भारत में किसी परिवर्तन की आवश्यकता है। जो चल रहा है, वह पहले से काफी अच्छा है। लेकिन विचार करने वाली बात यह है कि इन आंदोलनों में भरपूर हिंसा हो रही है। अहिंसा के मार्ग पर चलने वाले राष्ट्रपिता गांधी जी की आत्मा आज जहाँ भी होगी, द्रवित ही होगी, क्योंकि वे राष्ट्रपिता थे।
लेकिन सोचने योग्य बात यह है कि अचानक कई पश्चिमी देशों में ये दंगे यूँ ही नहीं भड़के। इन देशों ने मानवाधिकारों को समझते हुए शरणार्थियों को जगह दी। आज ये वही पश्चिमी देश हैं, जिनकी परिस्थितियों को देखकर हम सोचने पर विवश हो जाते हैं कि आखिर ये दंगों की चपेट में क्यों हैं? क्योंकि इनके जो शरणार्थी रहे, उनमें कहीं-न-कहीं ऐसे धर्म को मानने वाले लोग भी रहे हैं, जहाँ कथित रूप से यह माना जाता है कि काफ़िर को जहाँ देखो, वहाँ मार डालो।
कटु है, पर सत्य है। जाहिर-सी बात है कि इन शरणार्थियों ने भी अपनी संतति उत्पन्न की होगी। इन सभी देशों का वीज़ा भी प्राप्त किया होगा और फिर इनकी पीढ़ियों को वहाँ की नागरिकता भी आसानी से प्राप्त हुई होगी। आप युग बदल सकते हैं, पर मानसिकता नहीं। जाहिर-सी बात है कि हम जिस भी धर्म या मानसिकता के होते हैं, उसे ही आगे बढ़ाते हैं। जब किसी धर्म में यह सिखाया जाए कि तुम्हें हर उस व्यक्ति से नफ़रत करनी है, जो तुम्हारे धर्म का नहीं है, तो फिर ऐसा होना आम बात होगी।
इस प्रकार नकारात्मक सोच रखने वाले लोग आगे चलकर दूसरों के लिए खतरा बन सकते हैं। आज जो शरणार्थी बनकर देश में आए थे, वे वहाँ के नागरिक बनकर हिंसा फैला रहे हैं। ऐसा नहीं है कि भारत इस पैटर्न से अछूता है। यहाँ भी हमने जहाँ-जहाँ अपनी सेक्युलर होने की मानसिकता अपनाई, वहाँ-वहाँ हम टुकड़ों में विभाजित होते गए और हमारे ही कुछ लोग अन्य धर्म अपनाकर आज कट्टरपंथी हो गए हैं। आज हम किसी और देश के लिए नहीं, बल्कि अपने ही देश में अपने ही लोगों द्वारा अन्य धर्म अपनाने और कट्टरपंथी हो जाने के कारण उत्पन्न चुनौतियों का सामना करने के लिए विवश हैं।
यह विराम यहाँ नहीं लगेगा। शायद यही गृहयुद्ध की शुरुआत हो सकती है। हालाँकि, कई भविष्यवाणियों में हम सुनते हैं कि तृतीय विश्वयुद्ध होना है, तो मेरी धारणा है कि यह युद्ध तकनीक से भरपूर होगा। परंतु जमीनी हकीकत यह है कि युद्ध की आशंकाएँ और संघर्ष भी लोकतंत्र, राजनीति, धर्म तथा भेदभाव से ग्रस्त हैं।
यहाँ मानसिक गुलामी के चलते कुछ लोग राष्ट्रभक्तों को भी अंधभक्त कहते हैं। परंतु सच्चाई यह है कि विकासशीलता के मार्ग पर अग्रसर देश में यदि रोज़ आंदोलन होंगे और इस प्रकार आम जनता को आर्थिक मंदी के दौर से गुजरना पड़ेगा, तो विकास प्रभावित हो सकता है। हो सकता है कि हम कुछ समय तक आर्थिक रूप से सशक्त रहें, परंतु पूर्ण रूप से मजबूत नहीं हो पाएँगे। जब तक आप अपनी मानसिकता का विकास नहीं करेंगे, तब तक एक विकसित देश की कल्पना नहीं कर सकते। स्वयं को विकसित करने के लिए आज हमें आंदोलनों और सत्ता के नाम पर रोज़ होने वाले इन प्रपंचों को छोड़कर अपनी योग्यता के साथ आगे बढ़ना होगा और अपनी आर्थिक मजबूती पर ध्यान देना होगा। तभी हमारा देश युद्ध के समय में भी सुरक्षित रह सकता है।
आशी प्रतिभा( स्वतंत्र लेखिका)
साहित्यकार
मध्य प्रदेश, ग्वालियर










