Uncategorized
Trending

अंधकार पर प्रकाश की शाश्वत विजय का पर्व,” दीपावली “

: यह दीप, हृदय को प्रकाशित करने वाला
भारत पर्वों का देश है, पर यदि किसी एक पर्व को भारत की आत्मा कहा जाए तो वह है – दीपावली। यह केवल दीयों का पर्व नहीं, यह तो मानव मन के भीतर सोए हुए अंधकार को प्रकाश से, नैराश्य को आशा से, और विभेद को प्रेम से जीतने का महापर्व है।

“जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना।
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।।”

दीपावली शब्द संस्कृत के दो शब्दों से बना है – दीप + आवली, अर्थात दीपों की पंक्ति। जिस प्रकार अनेक दीप मिलकर एक माला बनाते हैं, उसी प्रकार अनेक कथाएँ मिलकर इस पर्व को महान बनाती हैं।
दीपावली क्यों मनाई जाती है? इसके उत्तर में केवल एक कथा नहीं, पाँच-पाँच दिव्य कथाएँ निहित हैं।

  1. रामायण कालीन कारण : मर्यादा की घर वापसी।

यह दीपावली का सबसे प्रसिद्ध और सबसे हृदयस्पर्शी कारण है।

कथा : त्रेतायुग में जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम लंकापति रावण का वध करके, चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात अपनी अर्धांगिनी सीता और अनुज लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे, तो वह कार्तिक मास की अमावस्या की घोर अंधेरी रात थी।

अयोध्या के प्रजा जनों ने अपने प्रिय राजा के स्वागत में घी के दीपक जलाए। पूरी अयोध्या नगरी दीपों से जगमगा उठी। अमावस्या की काली रात पूर्णिमा से भी अधिक प्रकाशमय हो गई। तब से यह दिन ‘राम की घर वापसी’ के उत्सव के रूप में मनाया जाता है।

उदा० : आज भी जब हम अपने घर में दिया जलाते हैं, तो वह केवल मिट्टी का दिया नहीं होता। वह प्रतीक है कि हमारे जीवन में भी यदि कोई ‘राम’ – अर्थात अच्छाई, सत्य – लंबे संघर्ष के बाद लौटता है, तो हमें भी अपने हृदय को दीयों से सजाना चाहिए। जैसे अयोध्यावासियों ने अपने घर सजाए थे।

  1. कृष्ण कालीन कारण : नारी सम्मान की रक्षा
  • द्वापर युग में प्राग्ज्योतिषपुर के अत्याचारी राजा नरकासुर ने 16,100 कन्याओं को बंदी बना रखा था। उनके विलाप से तीनों लोक कांप उठे। तब श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ नरकासुर का वध किया और उन सभी कन्याओं को मुक्त कराया। नरकासुर वध के अगले दिन द्वारका में दीप जलाकर उत्सव मनाया गया।
  • दीपावली हमें सिखाती है-
  • “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता ।।
    जहाँ नारी का अपमान होता है, वहाँ अंधकार होता है और जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहाँ दीपावली होती है। इसीलिए दीपावली के दूसरे दिन को ‘नरक चतुर्दशी’ भी कहते हैं।

उदा० : आज के संदर्भ में जब एक बेटी पढ़-लिख कर घर लौटती है, नौकरी पाती है, तो पिता के मन में जो गर्व का दीप जल उठता है, वही तो नरकासुर वध के बाद की दिवाली है।

  1. पौराणिक कारण : लक्ष्मी का समुद्र मंथन से प्राकट्य समुद्र मंथन की पौराणिक कथा के अनुसार कार्तिक अमावस्या के दिन ही क्षीर सागर से धन, वैभव और सौंदर्य की अधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी प्रकट हुई थीं। देवताओं ने उनका वरण किया और उनके स्वागत में स्वर्ण दीप जलाए।

इसीलिए दीपावली पर हम महालक्ष्मी और विघ्नहर्ता गणेश की पूजा करते हैं। गणेश बुद्धि के देवता हैं और लक्ष्मी धन की। संदेश स्पष्ट है – बुद्धि के बिना धन निरर्थक है और धन के बिना बुद्धि अधूरी है।

जैसे व्यापारी वर्ग इस दिन अपने बही-खाते – ‘चोपड़ा पूजन’ करता है। किसान अपनी नई फसल का पूजन करता है। एक गृहिणी अपने घर की सफाई करती है। क्यों? क्योंकि लक्ष्मी वहीं आती है जहाँ स्वच्छता, परिश्रम और पवित्रता का प्रकाश हो। गंदे, अंधेरे कोने में लक्ष्मी नहीं ठहरती।

  1. ऐतिहासिक कारण : विक्रमादित्य और आर्यसमाज की विजय-गाथा कहा जाता है -कि इसी दिन उज्जयिनी के महान सम्राट विक्रमादित्य का राज्याभिषेक हुआ था और उनके नाम से विक्रम संवत का प्रारंभ हुआ।

साथ ही, इसी दिन आर्य समाज के प्रवर्तक महर्षि दयानंद सरस्वती ने अंधविश्वास के अंधकार को वेदों के प्रकाश से दूर करने का संकल्प लिया था।

जैसे: इसलिए दीपावली केवल धार्मिक नहीं, ऐतिहासिक स्वाभिमान का भी पर्व है।

5. आध्यात्मिक कारण : आत्मा के भीतर का दीप

यह दीपावली का सबसे गूढ़ और सुंदर अर्थ है।

हमारे ऋषियों ने कहा – “तमसो मा ज्योतिर्गमय” – अर्थात हे प्रभु, हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो।

बाहर का दिया तो हम जला लेते हैं, पर भीतर का दिया? भीतर के दिए हैं – ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, लोभ। दीपावली पर हम बाहर दीपक जलाते हैं, पर संकल्प भीतर का अंधकार जलाने का लेते हैं।

: दीपावली आज क्यों प्रासंगिक है?

आज जब विश्व प्रदूषण, युद्ध, घृणा और अवसाद के अंधकार से घिरा है, तब दीपावली का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है।

1. संगठित रहो : एक दिया आंधी में बुझ जाता है, पर हजार दीयों की पंक्ति आंधी को भी हरा देती है। एकता ही शक्ति है।

2. स्वयं जलो, औरों को प्रकाश दो : दिया स्वयं जल कर दूसरों को प्रकाश देता है। यही भारतीय संस्कृति का मूल है – ‘आत्मदीपो भव’।

3. छोटा ही सही, प्रकाश बनो : अमावस्या कितनी भी घनी हो, एक छोटे से दीये के आगे हार जाती है। आप छोटा ही सही, पर किसी के जीवन में प्रकाश बनिए।

दीप जला कर दिवाली तो सभी मना लेते हैं,
मजा तो तब है जब कोई दिल में दिया जला ले।
बाहर की रोशनी तो बाजार से मिल जाती है,
भीतर की रोशनी खुद को जलाकर ही मिलती है।

लेखिका/शिक्षिका; अन्नपूर्णा मालवीया सुभाषिनी संस्कृत (प्रवक्ता ) प्रयागराज उत्तर प्रदेश।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *