
रात बहुत गहरी थी,
अँधेरा बहुत पुराना था,
पर एक छोटे से मिट्टी के दीपक ने
पूरे अँधेरे से कह दिया –
“मैं हार नहीं मानूँगा।”
और फिर क्या था,
एक दीपक से दूसरा जला,
दूसरे से तीसरा,
और देखते ही देखते
पूरा गाँव,
पूरा शहर,
पूरा देश जगमगा उठा।
दीपावली केवल दीपों का त्योहार नहीं है,
यह उस छोटे से दीपक की जीत का त्योहार है,
जो अँधेरे से डरा नहीं,
जो तूफान में भी बुझा नहीं,
जो जलता रहा, ताकि कोई और
रास्ता भटक न जाए।
“घर लौट आओ हे राम“
आज अयोध्या में फिर से
वही पुरानी रात लौटी है,
जब चौदह वर्ष के वनवास के बाद
राम घर लौटे थे।
माँ कौशल्या ने आरती उतारी थी,
प्रजा ने दीप जलाए थे,
और सीता ने मुस्कुरा कर कहा था –
“अब कोई वनवास नहीं, अब केवल उजाला होगा।”
आज भी जब हम दीप जलाते हैं,
तो हम उसी राम को अपने घर बुलाते हैं,
उसी सीता के धैर्य को,
उसी लक्ष्मण के त्याग को,
और उसी हनुमान की भक्ति को।
“माँ लक्ष्मी की आहट“
संध्या होते ही
आँगन को लीपा जाता है,
द्वार पर रंगोली बनाई जाती है,
और तुलसी के पास एक दीप रख कर
माँ से कहा जाता है –
“हे माँ,
धन नहीं चाहिए,
बस इतनी कृपा करना
कि घर में कभी
प्रेम की कमी न हो।
भाई-भाई में बैर न हो,
बच्चों के चेहरों पर
मुस्कान बनी रहे।”
और सच मानिए,
माँ लक्ष्मी वहीं आती हैं,
जहाँ दीपक के साथ-साथ
मन भी साफ़ होता है।
‘विशेष प्रार्थना “
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इस दीपावली,
आइए एक दीपक ऐसा भी जलाएँ
जो किसी दुकान से नहीं खरीदा गया हो,
जो मन की मिट्टी से बना हो।
एक दीपक किसी भूखे के लिए,
एक दीपक किसी उदास के लिए,
एक दीपक उस सैनिक के लिए
जो सीमा पर हमारी दीपावली की
रक्षा कर रहा है।
क्योंकि दीपावली का असली अर्थ यही है –
एक दीपक दूसरे दीपक को जलाए,
*एक मन दूसरे मन को उजाला अहृलादित कराए।।
जलाओ दीप, मिटाओ अँधेरा,
प्रेम से भर दो यह जग सारा।
दीपावली है यही संदेशा,
हर मन में हो उजियारा।
कवयित्री/ लेखिका/ साहित्यकार/ शिक्षिका; डॉ अन्नपूर्णा मालवीया सुभाषिनी संस्कृत प्रवक्ता प्रयागराज उत्तर प्रदेश।











