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कइसे धरीं हो हम धीर


कइसे धरीं हो हम धीर सजनवां
कइसे धरीं हो हम धीर!

जब जब बगिया में बोले ले कोयलिया,
हियरा में चूभेला तीर !
कइसे धरीं हो हम धीर सजनवां,
कइसे धरीं हो हम धीर !!

पीयू पीयू बोले पपीहरा जब-जब,
जीयरा में उठेला पीर !
कइसे धरीं हो हम धीर सजनवां ,
कइसे धरीं हो हम धीर !!

उमड़ घुमड़ सावन में मेघा जब
बरसे, मनवां होला अधीर !
कइसे धरीं हो हम धीर सजनवां,
कइसे धरीं हो हम धीर !!

बगिया में जब नाचे मन मोरवा,
ठौरवा निहारुं सहि पीर !
कइसे धरीं हो हम धीर सजनवां,
कइसे धरीं हो हम धीर !!

निंदिया न आवे मोहीं बिरही
सेजरिया,निरखे नैनवां लकीर !
भइल तोहरे बिन सूंन जीवनवां,
कइसे धरीं हो हम धीर !!

सावन बीतल भादों बीतल ,
बीतल चईत फगुनवां !
गइल बसंत न अइल अबहूं ,
ढरके नयनवां से नीर !!

कइसे धरीं हो हम धीर सजनवां
कइसे धरीं हो हम धीर

आइल शरद न अइल अबहूं ,
आके हरहो अब पीर !
कइसे धरीं हो हम धीर सजनवां,
कइसे धरीं हो हम धीर !!

कमलेश विष्णु सिंह “जिज्ञासु”

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