
मनुष्य के जीवन में यदि कोई भावना सबसे अधिक सुंदर, रहस्यमयी और शक्तिशाली है, तो वह है प्यार अर्थात् प्रेम। प्यार वह अनुभूति है जो दो दिलों को जोड़ती है, रिश्तों में मिठास भरती है और जीवन को अर्थ प्रदान करती है। लेकिन कभी-कभी जब प्रेम में दर्द, विरह, तड़प और बिछड़न मिलती है, तब मन अनायास पूछ बैठता है “प्यार काहे बनाया राम ने?” यह प्रश्न केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उन सभी दिलों का है जिन्होंने कभी प्रेम किया है। जब प्रेम सुख देता है तो जीवन स्वर्ग जैसा लगता है, लेकिन जब वही प्रेम दुख देता है तो मन ईश्वर से शिकायत करने लगता है। आखिर भगवान ने ऐसी भावना क्यों बनाई, जो हँसाती भी है और रुलाती भी है ? प्रेम प्रकृति का सबसे सुंदर और अनुपम उपहार है। यदि संसार में प्रेम न होता, तो माँ की ममता न होती, पिता का स्नेह न होता, भाई-बहन का अपनापन न होता और मित्रता की मिठास भी नहीं होती। प्रेम ही वह शक्ति है जो इंसान को इंसान बनाती है। प्रेम के बिना जीवन केवल सांसों का चलना भर रह जाता है। भगवान राम ने प्यार इसलिए बनाया कि मनुष्य केवल अपने लिए न जिए, बल्कि दूसरों के सुख-दुख को भी महसूस कर सके। प्रेम हमें त्याग, समर्पण, करुणा और संवेदना सिखाता है। जब कोई व्यक्ति किसी से प्रेम करता है, तब वह अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरे के लिए सोचने लगता है। यही प्रेम की सबसे बड़ी विशेषता है। लेकिन प्रेम केवल मिलन का नाम नहीं है। प्रेम में बिछड़न भी है, प्रतीक्षा भी है, तड़प भी है और संघर्ष भी। राधा और कृष्ण का प्रेम इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। दोनों का प्रेम अमर है, फिर भी उनका सांसारिक मिलन नहीं हुआ। इसके बावजूद उनका प्रेम आज भी लोगों के हृदय में जीवित है। इससे यह शिक्षा मिलती है कि सच्चा प्रेम केवल पाने का नहीं, बल्कि महसूस करने का नाम है। प्रेम की पराकाष्ठा अधिकार में नहीं, बल्कि समर्पण में दिखाई देती है। जब प्रेम में धोखा मिलता है या कोई अपना दूर चला जाता है, तब मन टूट जाता है। उस समय लगता है कि यदि प्रेम न होता तो यह दर्द भी न होता। लेकिन सच तो यह है कि दर्द भी प्रेम की गहराई को समझाता है। जिस दिल ने कभी प्रेम नहीं किया, वह प्रेम की खुशी और उसकी पीड़ा दोनों से अनजान रहता है। प्रेम हमें मजबूत बनाता है, जीवन के नए अर्थ सिखाता है और हमें भावनात्मक रूप से परिपक्व करता है। कई बार प्रेम एक परीक्षा की तरह होता है। ईश्वर देखता है कि मनुष्य अपने प्रेम में कितना सच्चा है। क्या वह केवल पाने के लिए प्रेम करता है या बिना किसी स्वार्थ के भी प्रेम कर सकता है? यही कारण है कि प्रेम में धैर्य, विश्वास और त्याग की आवश्यकता होती है। जिसने मानव जीवन में प्रेम नहीं किया, उसने जीवन को वास्तव में समझा ही नहीं और न ही उसे पूरी तरह जिया। प्रेम ही वह माध्यम है जिसके द्वारा मनुष्य जीवन की गुणवत्ता, उसकी वास्तविकता और उसके गूढ़ अर्थों को समझ पाता है। प्रेम जीवन को केवल सुंदर नहीं बनाता, बल्कि उसे सार्थक भी बनाता है। प्रेम मनुष्य को अपने भीतर झाँकना सिखाता है और उसे दूसरों के दुःख-सुख से जोड़ता है। प्रेम के बिना जीवन एक सूखी नदी की तरह है, जिसमें प्रवाह तो है, परंतु संगीत नहीं। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में भी प्रेम को ईश्वर तक पहुँचने का सबसे सरल और श्रेष्ठ मार्ग माना गया है। भक्ति का मूल तत्व प्रेम ही है। ईश्वर को केवल कर्मकांडों, अनुष्ठानों अथवा औपचारिक प्रार्थनाओं से नहीं, बल्कि निष्कलुष और सच्चे प्रेम से पाया जा सकता है। कबीर, मीरा, सूरदास और अनेक संतों ने प्रेम को ही परमात्मा तक पहुँचने का सेतु बताया है। प्रेम में अहंकार समाप्त हो जाता है और जहाँ अहंकार समाप्त होता है, वहीं ईश्वर का वास आरंभ होता है। यदि संसार में प्रेम न होता तो न कोई कविता जन्म लेती, न कोई गीत बनता और न ही साहित्य इतना समृद्ध होता। प्रेम ने ही कवियों को शब्द दिए, कलाकारों को रंग दिए और संगीतकारों को सुर दिए। प्रेम मानव सभ्यता की आत्मा है। इतिहास और साहित्य इस बात के साक्षी हैं कि प्रेम ने अनेक लोगों को अमर बना दिया। गोपालदास ‘नीरज’ की कविताओं में प्रेम की गहराई दिखाई देती है, साहिर लुधियानवी की शायरी में प्रेम की कसक झलकती है, अमृता प्रीतम की लेखनी में प्रेम की पीड़ा और सौंदर्य दोनों उपस्थित हैं। मीना कुमारी की संवेदनशीलता हो या देव आनंद का रोमानी व्यक्तित्व, प्रेम ने उनके जीवन और रचनात्मकता को विशेष पहचान दी। लोककथाओं और इतिहास में लैला-मजनूँ, हीर-रांझा, सोहनी-महिवाल जैसी प्रेम गाथाएँ आज भी जीवित हैं। ये केवल प्रेम कहानियाँ नहीं हैं, बल्कि प्रेम की उस शक्ति का प्रतीक हैं जो मनुष्य को साधारण से असाधारण बना देती है। प्रेम करने वाला व्यक्ति केवल प्रेमी नहीं रहता, वह संवेदनाओं का साधक बन जाता है। कई बार प्रेम ही मनुष्य को कवि, साहित्यकार, कलाकार और महान इंसान बना देता है। आध्यात्मिक गुरु ओशो रजनीश भी प्रेम को मनुष्य के आत्मिक विकास का मूल आधार मानते थे। उनका कहना था कि प्रेम ही वह द्वार है जहाँ से मनुष्य स्वयं को और परमात्मा को पहचान सकता है। प्रेम में डूबा हुआ मनुष्य सीमाओं से ऊपर उठ जाता है और अस्तित्व के साथ एकाकार होने लगता है। यही कारण है कि संसार की लगभग सभी आध्यात्मिक परंपराओं में प्रेम को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। इसलिए जब मन पूछे “प्यार काहे बनाया राम ने?” तो उसका उत्तर यही है कि राम ने प्यार इसलिए बनाया ताकि मनुष्य जीवन के वास्तविक अर्थ को समझ सके। प्रेम के माध्यम से वह दूसरों से जुड़े, संवेदनशील बने और अपने भीतर छिपे दिव्य गुणों को पहचान सके। प्रेम केवल सुख का नाम नहीं, बल्कि आत्मा की यात्रा है। यह वह शक्ति है जो मनुष्य को स्वयं से मिलाती है, समाज से जोड़ती है और अंततः ईश्वर के समीप ले जाती है।
अतः कहा जा सकता है कि प्रेम ईश्वर की सबसे सुंदर रचना है। इसमें आँसू भी हैं, मुस्कान भी है; विरह भी है और मिलन भी। इसमें प्रतीक्षा भी है और प्राप्ति भी। शायद इसी कारण राम ने प्यार बनाया, ताकि जीवन केवल जीया न जाए, बल्कि दिल से महसूस भी किया जाए। प्रेम ही वह शक्ति है जो मनुष्य को ईश्वर के सबसे करीब ले जाती है। यही प्रेम की सच्ची महिमा है, यही जीवन का सबसे बड़ा सत्य है । कवि के शब्दों में प्रेम : –
प्रेम काहे को बनाया राम ने,
दिल में ऐसा दीप जलाया राम ने।
आँसू, विरह, मिलन सब सौंप दिए,
जीवन का अर्थ समझाया राम ने।
रूपेश कुमार, प्रतियोगी छात्र/लेखक
चैनपुर, सीवान, बिहार










