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रात, खामोशी और समय

रात अब सिर्फ़ अँधेरा नहीं लगती,
ख़ामोशी भी उसकी सदा नहीं लगती।

हवा ठंडी है, पर दिल में है गर्माहट,
उसकी याद अब कोई हवा नहीं लगती।

उम्र के साथ बदला है चेहरा मेरा,
पर ये मोहब्बत ज़रा भी पुरानी नहीं लगती।

मैं उसे छूना नहीं, पास बैठना चाहता हूँ,
ये चाहत जिस्म की दुआ नहीं लगती।

उसके होने का एहसास बसता है मुझमें,
बात अब शब्दों की अदा नहीं लगती।

वक़्त ने सिखा दिया ठहर कर चाहना,
अब ये चाहत कोई जल्दबाज़ी नहीं लगती।

हर मुलाक़ात में गहराई बढ़ती गई,
ये मोहब्बत अब सिर्फ़ याद नहीं लगती।

न हक़ है, न सवाल, न कोई बंदिश यहाँ,
ये इश्क़ अब किसी सीमा में नहीं लगती।

आर एस लॉस्टम

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