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गर्जन

कालनेमी विचर रहे है,
प्रश्न जटिल सा लगता है।
संकट आई जब भी सत्ता पर,
सत्ताधीश मुझे कुटिल लगता है।
बौने हो गये तर्क जहां में,
संकट के बादल उमड़ रहे।
सिंहनाद की गर्जन से,
धरती अंबर डोल रहे।
धुनी लगी है राम नाम की,
सागर नदियां सब मौन है।
उंगली उठा रहे एक दूजे पर
इसका असली दोषी कौन है।
सत्ता पर जब जो भी बैठा है,
वह घमंड में चूर हुआ।
सब कालखंड में विचर के देखो,
ऐसा व्यक्तित्व मनुज से दूर हुआ।
सब स्वार्थ के पुतले है जग में,
राग सब अपना गाते हैं।
राजा मंत्री संत गृहस्थी,
सब राम की रोटी खाते है।

कवि संगम त्रिपाठी

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